सामाजीकरण के प्रमुख सिद्धान्त ;Theories of Socialization in hindi

Samajikaran Ke pramukhya siddhant समाजीकरण के प्रमुख सिद्धान्त निम्न है कूले का सिद्धान्त दुर्खीम का सिद्धान्त मीड का सिद्धान्त फ्रॉयड का सिद्धान्त

सामाजीकरण के प्रमुख सिद्धान्त (Samajikaran Ke Pramukh Sidhant)

Samajikaran ka Siddhant; समाजीकरण क्या है? समाजीकरण कैसे होता है? वे कौन-सी अभिप्रेणाएँ है, जो बालक को किसी क्रिया को करने के लिए प्रेरित करती है? इन सभी प्रश्नों के उत्तर जानने के लिए समाजशास्त्रियों अपने अपने सिध्दांतों लोगो के सामने प्रस्तुत करें हैं। इनमे कूले, जाॅर्ज मीड, फ्रायड, दुर्खीम का सिद्धांत प्रमुख हैं। समाजीकरण के द्वारा व्यक्ति के आत्म या स्व का विकास होता है। इन्ही विकास की प्रक्रियाओ को विचारको ने अपने-अपने सिद्धांतों द्वारा स्पष्ट किया हैं।

Samajikaran ke pramukh sidhant

समाजीकरण के प्रमुख सिद्धांत निम्नलिखित हैं--

(1) कूले का सिद्धान्त (Cooley's Theory)

कूले ने अपनी विचारधारा को 'स्व' (Self) और 'सामाजिक सम्पर्क' (Social Contact) के आधार पर व्यक्त किया है। कूले का कहना है कि जब तक एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के सम्पर्क में नहीं आता और उसकी आदतों, मनोभावों, विश्वासों तथा विचारों से परिचित होने का अवसर नहीं। प्राप्त होता, तब तक वह कभी भी अपने सम्बन्ध में कोई विचार नहीं पनपा पाता।

व्यक्ति के 'स्व' का विकास अन्य व्यक्तियों के साथ अन्तःक्रियायें करने के परिणामस्वरूप होता है। समाज के प्रति जागरूकता या चेतना भी दूसरे लोगों के सम्पर्क में आने से ही उत्पन्न हो सकती है। यदि दूसरे व्यक्ति से अपने बारे में बुराई सुनता रहता है तो उसमें स्वयं के बारे में हीन भावना ग्रन्थि (Inferiority Complex) पैदा हो जाती है। ये दोनों ही ग्रन्थियाँ व्यक्ति के उचित विकास में सहायक नहीं हैं।

इस प्रकार 'स्व' को समुचित रूप से विकसित करना ही सामाजीकरण का प्रधान तत्व है। वास्तव में सामाजिक 'स्व' वह आत्म दर्पण है जिसमें व्यक्ति अपने व्यवहार को सामाजिक दृष्टिकोण से देखकर उसका मूल्यांकन करता है। व्यक्ति अपने सामाजिक 'स्व' रूपी सामाजिक दर्पण में अपने आपको देखकर अपनी कमियों को पहचानता है और उन्हें दूर करने का प्रयत्न करता है, अतः सामाजिक 'स्व' के विकास को ही हम सामाजीकरण कह सकते हैं।

कूले (Cooley) ने लिखा है कि दूसरे व्यक्तियों के विचार और निर्णय शक्ति 'स्वयं का आइना' (Looking glass self) है और इसी के आधार पर व्यक्ति के विचार, मनोभाव, आदतों आदि का विकास होता है अर्थात् उसका सामाजीकरण होता है। इन्हें के आधार पर व्यक्ति समाज के अनुकूलन प्राप्त करता है और सामाजिक गुणों का विकास करता है। आत्म दर्पण है जिसमें व्यक्ति अपने व्यवहार को सामाजिक दृष्टिकोण से देखकर उसका मूल्यांकन करता 84 व्यक्ति अपने सामाजिक रूपी सामाजिक दर्पण में अपने आपको देखकर अपनी कमियों को पहचानता है और उन्हें दूर करने का प्रयत्न करता है, अतः सामाजिक 'स्व' के विकास को ही हम सामाजीकरण कह सकते हैं।

कूले (Cooley) ने लिखा है कि दूसरे व्यक्तियों के विचार और निर्णय शक्ति 'स्वयं का आइना' (Looking glass self) है और इसी के आधार पर व्यक्ति के विचार, मनोभाव, आदतों आदि का विकास होता है अर्थात् उसका सामाजीकरण होता है। इन्हें के आधार पर व्यक्ति समाज के अनुकूलन प्राप्त करता है और सामाजिक गुणों का विकास करता है।

(2) दुर्खीम का सिद्धान्त (Durkheim's Theory)

दुर्खीम ने सामाजीकरण की प्रक्रिया को अपने सामूहिक प्रतिनिधित्व' की अवधारणा के आधार पर समझाने का प्रयास किया है। 'सामूहिक प्रतिनिधित्व' से उसका तात्पर्य समाज में विचारों की व्यवस्था ( system of ideas) व्यवहार, प्रतिमानों (behaviour patterns) तथा सामाजिक प्रवृत्तियों एवं मूल्यों (Social attitude and values) से है।

कीनिंग ने लिखा है, "सामूहिक प्रतिनिधित्व से उसका तात्पर्य समूह के उन अनुभवों, विचारों एवं आदर्शों से है जिन पर मनुष्य अपने विचारों, मनोवृत्तियों और व्यवहार के लिए अचेतन रूप से निर्भर रहता है।" प्रत्येक समाज में कुछ ऐसी धरणायें, विचार मान्यतायें, विश्वास आदि पाये जाते हैं जिन्हें समाज के अधिकतर व्यक्ति सामान्य रूप से मानते हैं, क्योंकि ये विचार, विश्वास, मान्यतायें आदि सब लोगों के द्वारा माने जाते हैं इसलिए ये समूह का प्रतिनिधित्व करते हैं और सामूहिक प्रतिनिधान कहलाते हैं। ये सामूहिक प्रतिनिधान किसी एक व्यक्ति के लिए नहीं बल्कि सबके लिए होते हैं। ये सब व्यक्ति को प्रभावित करते हैं।

व्यक्ति के समूह का सदस्य होने के नाते उन्हें अपना समझ कर ग्रहण कर लेता है। "सामूहिक प्रतिनिधित्व" अर्थात् समाज के मूल्यों, मनोवृत्तियों, विचारों आदि को ग्रहण करना ही सामाजीकरण है। इन सामूहिक प्रतिनिधानों के प्रति लोगों में आस्था, आदर व सम्मान रहता है और इनके पीछे साकूहिक अभिमिति होती है इसलिए वे अत्यन्त प्रभावशाली होते हुए बिना ही प्रभावित करते रहते हैं। स्थिति विशेष के अनुसार गुणों को विकसित करता है।

माता-पिता, शिक्षक, समाज, सरकार आदि सभी बच्चों को शिक्षित बनाने के पक्ष में होते हैं। अतः बच्चों की शिक्षा एक सामूहिक विचार है और इसी विचार या सामूहिक प्रतिनिधित्व के कारण बच्चों की शिक्षा सम्भव हो पाती है।

(3) मीड का सिद्धान्त ( Mead's Theory)

मीड के सिद्धान्त को कुछ समाजशास्त्रियों ने "i " और 'Me' का सिद्धान्त भी कहा है। वैसे कूले और मीड के सिद्धान्त में कोई विशेष अन्तर नहीं है। मीड के मतानुसार सामाजीकरण की प्रक्रिया में ‘अपने सम्बन्ध में चेतना' या स्व चेतना महत्वपूर्ण है। व्यक्ति जब स्वयं के सम्बन्ध में चेतन होता है, तभी वह दूसरे के मनोभावों, विचारों और आदर्शों के सम्बन्ध में जागरूक हो सकता है।

बच्चा आरम्भिक अवस्था में अपने तथा दूसरों के बीच भेद नहीं कर पाता। खिलौने से खेलते हुए वह उसे भी जीवित प्राणी मान लेता है और उसके प्रति भी वह वैसा ही व्यवहार करता है जैसा कि उसके प्रति उसके माता पिता करते हैं। परन्तु कालान्तर में वह यह अनुभव करता है कि खिलौने, गुड़िया, गुड्डे आदि का व्यवहार उसके प्रति उस प्रकार का नहीं है जैसा कि माता-पिता के व्यवहारों के प्रतिक्रिया में वह व्यवहार करता है।

इस प्रकार बच्चे में इस चेतना का विकास होता है कि वह स्वयं माता या पिता नहीं है, न ही गुड़िया या खिलौना वह स्वयं है बल्कि वह इनसे कुछ अलग है और उसका अस्तित्व इनसे प्रथम है। स्वयं की इसी चेतना के विकसित हो जाने पर बालक दूसरों के प्रति अपने व्यवहार को नियोजित करता है, नवीन आदतों को सीखता है और सामाजिकता को विकसित करता है अर्थात् उसका सामाजीकरण हो जाता है।

(4) फ्रायड का सिद्धान्त (Freud's Theory)

फ्रायड ने सामाजीकरण की व्याख्या का अबोधात्मा या इद (Id), बोधात्मा या अहम् (ego) तथा आदर्शात्मा या पराहम् (super ego) की धारणा के आधार पर समझाने का प्रयास किया है।

(1) द्रव या अबोधात्मा (Id)

फ्रायड के अनुसार हर व्यक्ति में कुछ पाशविक प्रवृत्तियाँ होती जो वह जन्म से अपने साथ लेकर आता है। फ्रायड ने इसे उबलते हुए उद्वेगों की कढ़ाई कहा है। अपनी 'इद' के कारण व्यक्ति अच्छाई-बुराई या नैतिक-अनैतिक विचार किए बिना अपनी प्राथमिक आवश्यकताओं को सन्तुष्ट करने का प्रयास करता है।

(2) बोधात्मा का अहम् (Ego)

यह व्यक्ति का तार्किक पक्ष है। इसे हम व्यक्ति की बुद्धि या चिन्तन शक्ति भी कह सकते हैं। अन्य सदस्यों द्वारा जब बच्चे को चेतन रूप से सोच-समझ कर समाज की प्रथाओं, परम्पराओं व मूल्यों के अनुसार कार्य या व्यवहार करने की शिक्षा दी जाती है तो इसके इगो. या अहम् या बोधात्मा के विकास का काल होता है।

(3) आदर्शात्मा या पराहम् (Super ego)

यह नैतिक स्तर है। यह बोधात्मा और अबोधात्मा दोनों को ही नैतिकता, आदर्श एवं धर्म के बारे में अवगत कराती है। इसका कार्य व्यक्ति की पाशविक प्रवृत्तियों पर नियन्त्रण कराना तथा उन्हें अपने समान बनाना होता है जिससे वह समाज विरोधी कार्य न कर सके। इस प्रकार इस स्तर पर व्यक्ति सांस्कृतिक मूल्यों के अनुसार कार्य करता है साथ ही दूसरों को भी यह शिक्षा देता है।

फ्रायड का कहना है कि पराहम या आदर्शात्मा (Super Ego) का विकास ही सामाजीकरण का अन्तिम स्तर है और इसी स्तर पर मनुष्य सामाजीकृत कहलाता है। आधुनिक समाजशास्त्री एवं मनोवैज्ञानिक फ्रायड की उपर्युक्त व्याख्या को अनुपयुक्त ही ठहराते हैं।

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