भारत के प्रमुख ऐतिहासिक स्थल - Historical Monuments Of Ancient India In Hindi

Top Historical Places of ancient India, भारत का इतिहास इतना समृद्ध है कि देश के सभी हिस्से में आपको प्राचीन, भव्य और ऐतिहासिक स्थल देखने को मिल जाएंगे

भारत का इतिहास इतना समृद्ध है कि देश के सभी हिस्से में आपको एक से बढ़कर एक प्राचीन, भव्य और ऐतिहासिक स्थल देखने को मिल जाएंगे। इन सभी ऐतिहासिक स्थलों के पीछे प्यार, वीरता, ताकत और युद्ध की प्रसिद्ध कहानियां छिपी है।

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इस लेख में हम आपको प्राचीन भारत के महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थलों की (Top Historical Places of ancient India) जानकारी देंगे। जो एतिहासिक दृष्टि से अपना एक अलग महत्व रखते हैं।

Prominent And Historical Places Of India ( भारत के प्रमुख और ऐतिहासिक स्थान )

1. बोध गया

बोध गया वर्तमान बिहार प्रान्त में गया से लगभग सात मील की दूरी पर दक्षिण में स्थित है। बोध गया का अत्यन्त ऐतिहासिक महत्व है। क्योंकि बोध गया में ही महात्मा बुद्ध को बोधि वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ था। बोध गया में मौर्य सम्राट अशोक ने एक बौद्ध मन्दिर का निर्माण कराया था जिसका उल्लेख ह्वेनसांग ने भी किया है। इस मन्दिर में जातक कथाओं, यक्ष-यक्षणियों, आदि की मूर्तियों को उत्कीर्ण किया गया था।

2. कौशाम्बी

प्राचीनकाल में कौशाम्बी वत्स राज्य की राजधानी थी। कौशाम्बी की स्थापना राजा कुशाम्ब ने की थी । उसी के नाम पर इसका नाम कौशाम्बी पड़ा। महात्मा बुद्ध का समकालीन कौशाम्बी का शासक उदयन था। मौर्यकाल में कौशाम्बी मौर्य साम्राज्य का अंग था। यहां सम्राट अशोक ने दो स्तम्भ लगवाए थे। कौशाम्बी पर कुछ समय के लिए कृपाणी का भी आधिपत्य रहा तत्पश्चात् गुप्त शासक समुद्रगुप्त ने इसको अपने साम्राज्य में मिला लिया।

कौशाम्बी को वर्तमान समय में कोसम नामक ग्राम से जाना जाता है जो इलाहाबाद से लगभग 60 मील दूर यमुना के तट पर स्थित है।

3. सारनाथ

सारनाथ आधुनिक उत्तर प्रदेश में बनारस के समीप स्थित है। यह भारत के प्रमुख बौद्ध स्थलों में से एक है। कहा जाता है कि हिरणों के अधिक संख्या में रहने के कारण इसका नाम सारंगनाथ से सारनाथ पड़ा। कुछ लोगों का यह मानना है कि यहां एक शिव मन्दिर था और क्योंकि सारंगनाथ शिव का ही एक नाम है, अतः इस स्थान को सारनाथ कहा जाने लगा।

सारनाथ का ऐतिहासिक महत्व इसी तथ्य से स्पष्ट है कि यहीं पर महात्मा बुद्ध ने सर्वप्रथम धार्मिक प्रवचन दिया था। सारनाथ से प्राप्त अशोक के स्तम्भ पर सिंह मूर्तियां हैं जिन्हें भारत सरकार ने अपना राजचिह्न माना है। मौर्यकाल से 1200 ई. तक यह स्थान मूर्तिकला के लिए प्रसिद्ध था। फाह्यान, ह्वेनसांग व इत्सिंग ने भी सारनाथ की यात्रा की थी।

4. मथुरा

प्राचीनकाल में मथुरा को मधुवन के नाम से जाना जाता था। भगवान कृष्ण की जन्मस्थली होने के कारण प्राचीन समय से ही इसका विशेष महत्व रहा है। प्रथम शताब्दी ई. पू. में यहां शक शासन करते थे, कालान्तर में यहां नागवंशी शासकों का आधिपत्य हो गया।

फाह्यान तथा ह्वेनसांग ने मथुरा के विषय में लिखा है कि यहां के निवासी सभ्य एवं समृद्ध थे। ह्वेनसांग मथुरा के निवासियों से अत्यधिक प्रभावित हुआ था। कुषाण काल में यहां एक नवीन कला का विकास हुआ जिसे मथुरा-कला कहते हैं। महमूद गजनवी ने अपने भारत अभियान के समय मथुरा के मन्दिरों को लूटा था।

5. कुशीनगर

कुशीनगर वर्तमान उत्तर प्रदेश में स्थित है। कुशीनगर में ही महात्मा बुद्ध ने महापरिनिर्वाण (मृत्यु) प्राप्त किया था, अतः कुशीनगर का बौद्ध धर्म में विशेष महत्व है। इसी कारण कुशीनगर की गणना चार बौद्ध तीर्थस्थलों में की जाती है। सम्राट अशोक ने कुशीनगर की तीर्थ यात्रा करने के बाद यहां स्तूप, स्तम्भ व मठों का निर्माण कराया था। ह्वेनसांग ने लिखा है कि कुशीनगर में महात्मा बुद्ध की एक विशाल मूर्ति थी। यह मूर्ति आज भी कुशीनगर में विद्यमान है।

6. लुम्बिनी

कुशीनगर के समान लुम्बिनी भी चार तीर्थस्थलों में से एक है। लुम्बिनी की पहचान वर्तमान समय में नेपाल की तराई में स्थित रुम्मनदेई नामक स्थान से की जाती है। बौद्ध धर्म के संस्थापक महात्मा बुद्ध का जन्म लुम्बिनी में हुआ था, इसी कारण अशोक ने इस स्थान की यात्रा की थी तथा यहां के निवासियों को कर में छूट दी। अशोक ने एक लेख भी लुम्बिनी में उत्कीर्ण कराया था।

7. पाटलिपुत्र

वर्तमान समय में बिहार में स्थित पटना ही प्राचीनकाल में पाटलिपुत्र के नाम से जाना जाता था। इस स्थान को पहले 'पाटलिग्राम' कहते थे। अजातशत्रु के पुत्र उदयन ने मगध साम्राज्य की राजधानी राजगृह के स्थान पर पाटलिपुत्र को बनाया था। उस समय पाटलिपुत्र की उन्नति होना प्रारम्भ हुआ जो मौर्यकाल में अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच गई। पाटलिपुत्र मौर्य, शुंग एवं गुप्त वंशीय साम्राज्य की राजधानी रहा।

पाटलिपुत्र की मैगस्थनीज ने अत्यन्त प्रशंसा की है। मैगस्थनीज ने लिखा है कि पाटलिपुत्र समानान्तर चतुर्भुज के आकार में था, जो नौ मील लम्बा व डेढ़ मील चौड़ा था। सुरक्षा की दृष्टि से पाटलिपुत्र चारों ओर से पानी भरी खाई से घिरा हुआ था। नगर के बीच में चन्द्रगुप्त का राजमहल था। पाटलिपुत्र का व्यापारिक महत्व भी था क्योंकि वह व्यापारीय मार्गों से जुड़ा था।

8. श्रावस्ती

प्राचीन काल में श्रावस्ती कोसल जनपद के अधीन था। श्रावस्ती वर्तमान में भारत गोंडा जिले में स्थित था। कहा जाता है कि श्रावस्त नामक मुनि के नाम पर इस स्थान का नाम श्रावस्ती पड़ा। श्रावस्ती नगर छठी शताब्दी ई. पू. के प्रमुख नगरों में एक था। यह नगर चारों ओर से एक खाई से घिरा हुआ था। सुरक्षा की दृष्टि से नगर के चारों ओर एक दीवार का भी निर्माण किया गया था।

मुख्य व्यापारिक मार्ग पर होने के कारण इस नगर का विशेष व्यापारिक महत्व भी था । श्रावस्ती बौद्ध धर्म से सम्बन्धित एक प्रमुख नगर था। अशोक ने यहां पर एक स्तूप भी बनवाया था। दुर्भाग्यवश, ह्वेनसांग के भारत आगमन तक यह नगर लगभग उजड़ चुका था।

9. कान्यकुब्ज

वर्तमान कन्नौज को ही प्राचीन काल के कान्यकुब्ज के नाम से जाना जाता था। कान्यकुब्ज की स्थापना कुशनाथ ने की थी। मौखरि शासकों ने सर्वप्रथम कान्यकुब्जे को अपनी राजधानी बनाया। तत्पश्चात् अनेक राजवंशों ने कान्यकुब्ज को अपनी राजधानी बनाया जिनमें प्रमुख गुर्जर प्रतीहार एवं गहड़वाल वंश है। हर्ष के समय में कन्नौज उत्तर भारत का प्रमुख नगर बन गया।

हर्ष ने ही ह्वेनसांग के आगमन पर कान्यकुब्ज में धार्मिक सभा का आयोजन किया। ह्वेनसांग ने इस नगर का वर्णन करते हुए लिखा है कि कान्यकुब्ज एक समृद्ध नगर था जो तीन मील लम्बा व एक मील चौड़ा था जो चारों ओर से खाई से घिरा था। अल्बरूनी ने भी कान्यकुब्ज के वैभव व समृद्धि की प्रशंसा की है।

10. खजुराहो

झांसी से लगभग 160 किमी. व सतना से 120 किमी. छतरपुर जिले में खजुराहो स्थित है। खजुराहो में दसवीं व बारहवीं सदी के मध्य चन्देल शासकों ने भव्य मन्दिरों का निर्माण कराया। इन मन्दिरों में वैष्णव, जैन व शैव मन्दिर हैं। खजुराहो का सबसे प्रमुख मन्दिर कन्दारिया महादेव का मन्दिर है, जिसका निर्माण 1050 ई. में सम्राट धंग ने करवाया था। इसके अतिरिक्त देवी जगदम्बा, लक्ष्मण मन्दिर, लाल गांव मन्दिर भी दर्शनीय हैं। खजुराहो के मन्दिरों की शैली आर्यावर्तीय है।

खजुराहो के मन्दिरों की वास्तु कला एवं मूर्तिकला न केवल भारतीय पर्यटक वरन् विदेशी पर्यटकों को भी आकर्षित करती है।

11. प्रयाग

प्रयाग प्राचीन काल से ही भारत के प्रमुख नगरों में रहा है। गंगा व यमुना के संगम पर स्थित प्रयाग हिन्दुओं के तीर्थ स्थलों में से एक है। जनता का विश्वास है कि संगम में स्नान करने से लोग पाप रहित हो जाते हैं। कालिदास ने लिखा है कि संगम में स्नान करने मात्र से आत्मा को तत्व बोध के ज्ञान के बिना भी मुक्ति मिल जाती है।

ऐतिहासिक दृष्टि से भी प्रयाग का विशेष महत्व है। संगम के पास मुगल सम्राट अकबर ने एक किला बनवाया था। अशोक के एक स्तम्भ को कौशाम्बी से लाकर इस किले में स्थापित किया गया। था। अकबर द्वारा ही प्रयाग का नाम 'इलाहाबाद' रखा गया था। आधुनिक काल में भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन का भी प्रमुख केन्द्र इलाहाबाद रहा था।

12. काशी/वाराणसी

काशी प्राचीनकाल से ही भारत का प्रमुख नगर रहा है। काशी नगर वारह योजन में विस्तृत था। काशी को शिव की नगरी माना जाता है, इसी कारण हिन्दू यहां पर अपने जीवन के अन्तिम दिन बिताकर मोक्ष प्राप्त करते थे। उपनिषद काल में काशी एक प्रमुख राज्य था जिसकी राजधानी वाराणसी थी। काशी प्राचीनकाल में विद्याध्ययन का भी केन्द्र था।

सातवीं सदी में शंकराचार्य अपने मत का प्रतिपादन करने के लिए काशी आए. थे। वाराणसी को मन्दिरों तथा घाटों की नगरी माना जाता है। काशी के प्रमुख मन्दिरों में 'काशी विश्वनाथ, काल भैरव, कामाक्षादेवी मन्दिर, मीनाक्षी मन्दिर, अन्नपूर्णा मन्दिर, इत्यादि हैं। काशी के प्रमुख घाटों में राजघाट, प्रहलाद घाट, रामघाट, लक्ष्मण घाट, हरिश्चन्द्र घाट हैं।

13. नालन्दा

नालन्दा पटना से लगभग 55 मील की दूरी पर स्थित था। नालन्दा प्राचीन भारत में शिक्षा तथा बौद्ध धर्म का प्रमुख केन्द्र था। कहा जाता है कि मौर्य सम्राट अशोक ने ही यहां सर्वप्रथम एक विहार की स्थापना की थी। सम्राट हर्ष व पाल शासकों ने नालन्दा की यात्रा की थी। नालन्दा विश्वविद्यालय एक मील लम्बा तथा आधा मील चौड़ा था। नालन्दा में हुए उत्खनन से पता चलता है कि वहां सात विशाल कक्ष तथा 300 अध्यापन कक्ष थे।

ह्वेनसांग ने लिखा है कि कई हजार विद्यार्थी अध्ययन करते हैं। नालन्दा के आचार्य तथा कुलपति अत्यन्त योग्य हैं। यहां से शिक्षा प्राप्त विद्यार्थियों का सम्मान किया जाता है। विश्वविद्यालय में एक विशाल पुस्तकालय भी है। दान में मिले गांवों की आय से यहां के विद्यार्थियों को निःशुल्क आवास व भोजन उपलब्ध कराया जाता है। विद्यार्थियों को श्रम भी करना पड़ता है।

दुर्भाग्यवश इस प्रसिद्ध शिक्षा केन्द्र का बख्तियार खिलजी के आक्रमणों के कारण पतन हो गया। उसने इसे ध्वस्त कर दिया।

14. तक्षशिला

तक्षशिला वर्तमान पाकिस्तान में रावलपिंडी से 20 मील दूर झेलम व सिन्ध नदियों के बीच स्थित था। तक्षशिला भी प्राचीन काल में भारत का एक प्रमुख नगर था। भारत की सीमा पर स्थित होने के कारण तक्षशिला का अत्यधिक सामरिक महत्व था। जब-जब भारत पर विदेशी आक्रमण हुआ तब-तब तक्षशिला को आक्रान्ताओं का कोपभाजन बनना पड़ा। कहा जाता है कि भरत के पुत्र तक्ष ने इस नगर की स्थापना की थी। मौर्यकाल में यह नगर अत्यन्त समृद्ध था। मुख्य अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार मार्ग पर स्थित होने के कारण तक्षशिला का व्यापारिक महत्व भी था।

किन्तु तक्षशिला वास्तविक अर्थों में शिक्षा का एक प्रमुख केन्द्र होने के कारण ही जग प्रसिद्ध है। प्राचीनकाल में तक्षशिला विश्वविद्यालय शिक्षा का एक प्रमुख केन्द्र था। अनेक प्रसिद्ध व्यक्तियों ने यहां शिक्षा ग्रहण की थी, जिनमें प्रमुख पाणिनि, चाणक्य तथा जीवक हैं। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए दूर-दूर से छात्र यहां आते थे। सादा जीवन व उच्च विचार पर तक्षशिला में विशेष बल दिया जाता था। तक्षशिला विश्वविद्यालय गुरुकुल की पद्धति पर आधारित था। गरीब छात्रों को निःशुल्क शिक्षा प्रदान की जाती थी।

तक्षशिला की प्रसिद्धि का एक अन्य कारण कनिष्क के शासनकाल में यहां एक नवीन कला शैली का विकास होना भी था जो 'गान्धार कला' के नाम से जानी जाती है। इस कला के अन्तर्गत ही महात्मा बुद्ध की मूर्तियों का निर्माण हुआ।

15. अजन्ता

महाराष्ट्र में औरंगाबाद नगर से 36 मील की दूरी पर अजन्ता की गुफाए है। इन गुफाओं के विषय में 1819 ई. में जेम्स एलेक्जेण्डर ने पता लगाया था। अजन्ता की 12 9, 10, 16 व 17 नम्बर की गुफाएं प्रथम शताब्दी के सातवीं सदी के मध्य निर्मित है व इनमें फ्रेस्को चित्र कला है। यह चित्र आध्यात्मिक एवं लौकिक हैं। इन गुफाओं में 16 17 नम्बर की गुफाएं गुप्तकालीन हैं जिनमें गुप्त चित्रकला के विषय में विस्तृत जानकारी मिलती है। गुफा नम्बर 8, 9, 10, 12 व 13 आन्ध्री द्वारा निर्मित हैं। अजन्ता की गुफाओं के चित्रों में प्रमुख मरणासन्न राजकुमारी, बोधिसत्व, श्रावस्ती के देवता व बुद्ध के गृह त्याग का चित्र, आदि प्रमुख हैं।

16. एलौरा

महाराष्ट्र के औरंगाबाद शहर में एलौरा नामक स्थान गुहा मन्दिरों के लिए प्रसिद्ध है। दक्षिण भारत का यह स्थान बौद्धों का प्रसिद्ध केन्द्र भी रहा। एलौरा में पहाड़ को काटकर अनेक गुफाएं बनाई गई हैं। ये गुफाएं हिन्दू, बौद्ध व जैन धर्म से सम्बन्धित हैं। एलौरा में 12 गुफाएं हैं। ब्राह्मण धर्म से सम्बन्धित 16 गुफा मन्दिर हैं। जिनमें राष्ट्रकूट शासक कृष्ण प्रथम द्वारा निर्मित कैलाश मन्दिर अपनी स्थापत्य कला के लिए सबसे अधिक प्रसिद्ध है।

इन मन्दिरों में देवी-देवताओं, मनुष्यों व पशुओं की मूर्तियां उत्कीर्ण हैं। एलौरा में जैन धर्म से सम्बन्धित 5 गुफाएं हैं। ये गुफाएं भित्ति चित्रों के लिए प्रसिद्ध हैं। एलौरा के नीलकण्ठ, रोमेश्वर, दशावतार, रावण की खाई, इन्द्रप्रभा, आदि मन्दिर भी प्रसिद्ध हैं।

17. अयोध्या

अयोध्या नगरी कोसल राज्य में स्थित थी। भगवान राम की जन्म स्थली होने के कारण अयोध्या का सदैव से विशेष महत्व रहा है। अयोध्या इक्ष्वाकु वंशीय राजाओं की राजधानी थी। अयोध्या उत्तर प्रदेश में सरयूतट पर स्थित है। प्राचीन काल में इसके चारों और खाई व दीवार थी। इस नगर में लम्बी व चौड़ी सड़कें थीं। शुंग शासक पुष्यमित्र ने अयोध्या में ही दो अश्वमेध यज्ञ किए थे। प्राचीनकाल में अयोध्या को साकेत के नाम से जाना जाता था।

भारतीय संस्कृति के प्रत्येक क्षेत्र में अयोध्या का विशेष महत्व रहा है। छठी शताब्दी में जब श्रावस्ती राजधानी बनी तो अयोध्या का महत्व कम हो गया। अयोध्या बौद्ध धर्म के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण रहा है। महात्मा बुद्ध ने भी अयोध्या की यात्रा की थी। अयोध्या में अनेक प्रसिद्ध मन्दिर हैं जिनमें प्रमुख श्रीराम मन्दिर, हनुमान मन्दिर, तुलसीमानस मन्दिर, आदि हैं।

18. ग्वालियर

ग्वालियर वर्तमान मध्य प्रदेश का एक प्रमुख नगर हैं। कहा जाता है। कि इस नगर की स्थापना कुष्ठ रोग से पीड़ित राजा सूरज ने की थी। राजा सूरज का कुष्ठ रोग ग्वालिया नामक सन्त की कृपा से ठीक हुआ था, अतः उन्हीं के नाम पर इस नगर का नाम ग्वालियर रखा गया। ग्वालियर में अनेक दुर्ग हैं इसीलिए इसे दुर्गों का नगर कहा जाता है। ग्वालियर का प्रमुख दुर्ग अत्यन्त विशाल हैं जो 300 फुट की ऊंचाई पर बना हुआ है। इस दुर्ग में अनेक मन्दिर तथा प्रसिद्ध सिन्धिया कॉलेज है।

ग्वालियर का ऐतिहासिक महत्व बहुत अधिक है। गुर्जर-प्रतीहार शासक भोज ने ग्वालियर पर अधिकार किया था। सल्तनत काल में यहां प्रसिद्ध राजा मानसिंह तोमर ने राज्य किया जिसकी रानी का नाम मृगनयनी था। प्रसिद्ध संगीतज्ञ तानसेन इसी राजा मानसिंह के दरबार में था। तानसेन की कब्र ग्वालियर में ही है। वर्तमान समय में ग्वालियर ने एक औद्योगिक नगरी का रूप धारण कर लिया है, जहां वस्त्र उद्योग व टॉफी, बिस्कुट उद्योग विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

19. सांची

प्रमुख ऐतिहासिक नगर सांची मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के निकट स्थित है। सांची नगर बौद्ध स्तूपों के लिए प्रसिद्ध है। यहां परि तीन स्तूप हैं जिनमें से सबसे बड़े स्तूप का निर्माण मौर्य सम्राट अशोक ने कराया था। इस स्तूप की ऊंचाई 77 फुट तथा व्यास 110 फुट है। यह स्तूप प्रारम्भ में ईंटों से निर्मित था। इस स्तूप को शुंग काल में अन्तिम रूप प्रदान किया गया। इस स्तूप के चारों ओर पत्थर की वेदिकाएं बनी हुई हैं जिसमें चार तोरण द्वार भी हैं जो पैंतीस फुट ऊंचे हैं।

इन पर जातक कथाओं को चित्रित किया गया है। इस स्तूप के दक्षिण द्वार के पास अशोक का खण्डित अवस्था में एक स्तम्भ मिला है जिसके शीर्ष भाग पर सारनाथ के स्तम्भ के समान ही सिंह मूर्तियां बनी हुई है। सांची के शेष दो स्तूप ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी के बौद्ध दार्शनिक कश्यप व मोगदलीपुत्त से हैं।

20. हस्तिनापुर

हस्तिनापुर वर्तमान मेरठ जिले में गढ़गंगा नामक स्थान पर स्थित था। इस नगर की स्थापना महाराजा हस्तिन ने की थी। उन्हीं के नाम इस स्थान का नाम हस्तिनापुर पड़ा। महाभारत युग में इस स्थान का विशेष महत्व था तथा यह उस काल का एक प्रमुख नगर था। इस नगर के चारों ओर परकोटा था जिसमें ऊंचे-ऊंचे दरवाजे थे। सड़कों के दोनों और महल व बाजार थे। राजमहल नगर के बीच में स्थित था।

महाभारत में इस नगर की अत्यन्त प्रशंसा की गयी है कहा जाता है कि कालान्तर में गंगा नदी में बाढ़ आ जाने के कारण यह नगर नष्ट हो गया तथा यहां के निवासी कौशाम्बी जाकर रहने लगे।

21. कपिलवस्तु

कपिलवस्तु का नाम महर्षि कपिल के नाम पर आधारित है। कपिलवस्तु नेपाल की तराई में स्थित था जो शाक्य गणराज्य की राजधानी थी। कपिलवस्तु के शासक महात्मा बुद्ध के पिता शुद्धोधन थे। ह्वेनसांग ने कपिलवस्तु की यात्रा की थी। उसने लिखा है कि कपिलवस्तु में अनेक स्तूप हैं। नगर के भीतर एक सभा भवन है जहां गणराज्य के सदस्य एकत्रित होकर शासक विषयक विषयों पर निर्णय लेते हैं।

ह्वेनसांग ने कपिलवस्तु में एक विहार भी देखा था। बौद्ध ग्रन्थों में भी इस नगर के विषय में जानकारी मिलती है। बौद्ध ग्रन्थों में इसे 'नगरों में श्रेष्ठ' कहा गया है। कपिलवस्तु में सुन्दर विहार थे तथा यह एक अत्यन्त समृद्धशाली नगर था। कपिलवस्तु व्यापारिक दृष्टिकोण से भी एक महत्वपूर्ण नगर था।

22. अजमेर

अजमेर आधुनिक राजस्थान में स्थित है। अजमेर भारत का एक ऐतिहासिक नगर है। चौहानवंशीय पृथ्वीराज चौहान अजमेर का भी शासक था। कालान्तर में अजमेर पर कुतुबुद्दीन ऐबक का अधिकार हो गया जहां उसने 'अढ़ाई दिन का झोंपड़ा' नामक मस्जिद का निर्माण कराया।

अजमेर में प्रसिद्ध मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह है जहां लाखों भक्त प्रतिवर्ष आते हैं। यहां पर प्रतिवर्ष उर्स का मेला लगता है। अजमेर में पुष्कर हिन्दुओं का एक तीर्थ स्थल है। यहां पर जैन धर्म से सम्बन्धित एक प्रमुख मन्दिर भी है। अजमेर प्राचीन व मध्यकाल में भारत का एक प्रमुख नगर था।

23. जौनपुर

जौनपुर पूर्वी उत्तर प्रदेश का एक जिला है। जौनपुर की सल्तनत काल में स्थापना हुई। इस नगर की स्थापना 1359 ई. में फिरोज तुगलक ने जूना खां के नाम पर की थी। जौनपुर में अनेक भव्य इमारतें हैं जिनके कारण ही जौनपुर प्रसिद्ध है। जौनपुर की प्रमुख इमारतों में अटाला, मस्जिद, बड़ी मस्जिद, चार अंगुल की मस्जिद व शाही इमाम आदि हैं। ये इमारतें हिन्दू-मुस्लिम कला की प्रतीक हैं। जौनपुर का किला वर्तमान समय में क्षतिग्रस्त है।

24. भीतरगांव

भीतरगांव उत्तर प्रदेश में कानपुर से लगभग 22 मील दूरी पर स्थित है। भीतरगांव अपने विष्णु मन्दिर के कारण प्रसिद्ध है। इस मन्दिर का निर्माण गुप्तकाल में हुआ था। इस मन्दिर को ऊंचे चबूतरे पर बनाया गया है जिसके चारों ओर सीढ़िया थीं। मन्दिर के अन्दर एक गर्भगृह है, जिसमें भगवान विष्णु की मूर्ति है। मन्दिर की भीतरी दीवारों पर भी कलाकृतियां अंकित हैं। भीतरगांव का विष्णु मन्दिर गुप्तकला का अनुपम नमूना है।

25. कोणार्क

कोणार्क उड़ीसा में पुरी से लगभग 30 किलोमीटर दूर समुद्र तट पर स्थित है। यहां राजा नरसिंह देव (1238-63) के द्वारा बनाया गया प्रसिद्ध सूर्य मन्दिर है। यह मन्दिर 'काला पेगोडा' के नाम से प्रसिद्ध है। यह मन्दिर रथ की आकृति में है जिसमें 12 पहिये हैं। इसमें सूर्य के सात घोड़े हैं। मन्दिर में बनी मूर्तियां अत्यन्त सजीव हैं।

26. तंजौर

तंजौर चोल काल का अत्यन्त प्रसिद्ध कला केन्द्र था। यहां अत्यन्त भव्य शिव मन्दिर है जो लगभग 100 फुट लम्बा व 110 फुट ऊंचा है। यह मन्दिर कला का उत्कृष्ट उदाहरण है। इस मन्दिर का निर्माण चोल शासक राजराज प्रथम ने करवाया था। इस मन्दिर में नृत्य की मुद्रा में शिव की मूर्तियां हैं। इसमें शिव की नटराज की मुद्रा में मूर्ति है। इस मन्दिर को राज-राजेश्वर मन्दिर भी कहा जाता है।

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